बाज और अबाबील(skylark)

(Khalil Gibran)
एक बार की बात है कि एक skylark (अबाबील) और एक बाज की मुलाक़ात एक ऊँची चोटी पर हुई| अबाबील ने बाज से “good morning” कहा| और बाज ने नीचे झुक कर उसे देखा और धीरे से कहा “good morning|”

फिर अबाबील ने पूछा, “उम्मीद है sir कि आपके साथ सब कुछ बढ़िया चल रहा होगा|”

“हां,” बाज ने जवाब दिया, “हमारे साथ सब कुछ ठीक चल रहा है| लेकिन क्या तुम्हें पता है कि हम पक्षियों के राजा हैं, और इसलिए तुम्हें तब तक हमसे बात नहीं करनी चाहिए जब तक हम खुद तुमसे बात नहीं  करना चाहें?”

अबाबील ने कहा, “मुझे तो लगता था कि हम दोनों एक ही परिवार(family) से हैं”|

बाज ने उपेक्षा से उसे देखा और बोला, “यह तुमसे किसने कह दिया कि हम और तुम एक ही परिवार से हैं?”

अबाबील ने जवाब दिया, “लेकिन आपको याद रखना चाहिए कि, मैं, आपसे कहीं ऊंचा उड़ सकता हूँ, और गाना भी गा सकता हूँ और इस तरह धरती के दूसरे जीवों को खुशी दे सकता हूँ| वहीं आप न तो खुशी दे पाते हैं और न ही आनंद|”

अब तो बाज को गुस्सा आ गया, “ ‘खुशी और आनंद!’, तुम एक छोटे से जीव हो और अपनी औकात से बढ़ कर बोल रहे हो| अपनी चोंच के एक ही वार से मैं तुम्हें ख़त्म कर सकता हूँ| तुम तो मेरे पंजों के बराबर हो.”

अब तो झगडा बेहद बढ़ गया और अबाबील उड़ा और बाज की पीठ पर सवार हो गया और उसके पंखों को नोचने लगा| बाज परेशान हो गया, और तेजी से उड़ कर ऊँचाई पर पहुँच गया ताकि वह अबाबील से अपना पीछा छुड़ा सके| लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाया| आखिरकार दुखी होकर वह बड़ी पहाडी की उसी चट्टान पर वापिस आकर बैठ गया, छोटा सा पक्षी अभी उसकी पीठ पर सवार था, और वह उस घड़ी को कोस रहा था जब उसका सामना अबाबील से हुआ था|

उसी समय एक छोटा सा कछुआ वहां से गुजरा और उन्हें देखकर हंसने लगा और हँसते-हँसते लोट-पोट हो गया|

बाज, कछुए की ओर देखकर बोला, “जमीन पर रहकर रेंगने वाले छोटे से जीव, तुम हंस किस बात पर रहे हो?”

कछुए ने उसे जवाब दिया, “तुम तो घोड़े की तरह बन गए हो, और एक छोटा सा पक्षी तुम्हारी सवारी कर रहा है, लेकिन उस छोटे पक्षी के तो मजे हैं|”

अब बाज ने उसे जवाब दिया, “चलो जाओ और अपना काम करो| यह मेरे और मेरे भाई ‘अबाबील’ के बीच का मामला है|”

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2 thoughts on “बाज और अबाबील(skylark)

  • फ़रवरी 13, 2015 at 6:59 पूर्वाह्न
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    घमंड को चूर चूर करने वाली प्रेरणा देने वाली कहानी लिखी है आपने ! बढ़िया लगी

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  • फ़रवरी 13, 2015 at 7:56 पूर्वाह्न
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    शुक्रिया, सारस्वत जी|

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